Wednesday, December 31, 2008

हमारे सभी सुधी पाठकों को नव वर्ष २००९ की हार्दिक शुभकामनाए

नए वर्ष २००९ में कृपयाः
बीती ताहि बिसारिये...
संपूर्ण अंतरिक्ष गतिशील है और उसके साथ ही हमारी पृथ्वी भी गतिशील है। कुछ भी क्षण भर
स्थिर नहीं रह पाता। जो गुजर गया, वह गुजर गया। बीते हुए समय को किसी भी परिस्थिति में ज्यों का त्यों वापस नहीं लाया जा सकता। यह प्रकृति का शाश्वत नियम है। मानव जीवन की भी यही स्थिति है। बीते हुए कल को आज नहीं बनाया जा सकता और आज को आने वाला कल नहीं कहा जा सकता। गति के इस अनवरत क्रम में मनुष्य की आयु और ओज का प्रति पल क्षरण होता रहता है। परिस्थितियां और वातावरण बदलते रहते हैं। नए व्यक्तियों से परिचय होता है और पुराने व्यक्ति विस्मृति हो जाते हैं। हमारे संपर्क में आने वाले कुछ व्यक्ति हमें अपनी मधुर स्मृतियां दे जाते हैं, जो एकाकी क्षणों में हमें आह्लादित रखती हैं और कठिनाइयों से संघर्ष करने के लिए ऊर्जा प्रदान करती हैं। दूसरी तरफ इन्हीं में से कुछ व्यक्ति हमें ऐसी पीड़ा दे जाते हैं, जो हमें निरंतर सालती रहती हैं। इस पीड़ा में गलती हमारी हो सकती है या दूसरे की भी। जिस प्रकार वह पीड़ा हमें कष्ट पहुंचाती है, संभव है, वह उस दूसरे व्यक्ति को भी इसी प्रकार या उससे भी अधिक कष्ट पहुंचा रही हो। एक उक्ति है कि गलती करना मनुष्य का स्वभाव है। दूसरी है कि प्रत्येक गलती मनुष्य को कुछ शिक्षा दे जाती है। मनुष्य अपने पालने से लेकर कब्र तक निरंतर शिक्षा ग्रहण करता रहता है। शिक्षा ग्रहण करने से अभिप्राय स्कूल की किसी बेंच पर बैठकर अपना पाठ याद करने मात्र से नहीं है। यहां शिक्षा से अभिप्राय इन गलतियों से सबक सीखने से ही है। हमारा जीवन स्वयं हमारा गुरु भी है और हमारा शिष्य भी। अतीत से सबक सीखकर हम अपने वर्तमान को सुधारते हैं और भविष्य को नए सिरे से संवारने की कोशिश करते हैं। समय को कालखंडों में बांटने की परंपरा विश्व भर में अत्यंत प्राचीन है। उसका मुख्य उद्देश्य निश्चित समय का निर्धारण और उसके आधार पर इस सृष्टि का अध्ययन करना रहा है। लेकिन इसके साथ काल-निर्धारण का एक उद्देश्य अतीत को पहचानने और उस आधार पर भावी योजनाएं बनाना भी रहा है। हमारे पूर्वज एक निश्चित कालखंड के बाद अपनी पिछली गतिविधियों की समीक्षा करते थे और उसे अपना संबल बनाकर भविष्य की डगर पर अपने चरण रखते थे। इस संपूर्ण ब्रह्मांड हम मनुष्यों का अस्तित्व नगण्य जैसा है। ब्रह्मांड में असंख्य आकाश गंगाएं हैं, जिनमें एक है हमारी आकाशगंगा। हमारी अपनी आकाशगंगा में भी अनेक सौरमंडल हैं, जिनमें एक सौरमंडल है हमारा। इस सौरमंडल में भी अनेक ग्रह हैं, जिनमें एक है हमारी पृथ्वी। पृथ्वी पर रहने वाला विशाल जनसमुदाय और अनेक देश, जिनमें एक देश है हमारा। भारत की भी 100 करोड़ से अधिक विशाल जनसंख्या में से एक व्यक्ति यानी कि मैं। तब यह व्यर्थ का अहंकार क्यों? विश्व की अकूत संपदा के सामने हमारी कुछ हजार, लाख या करोड़ की संपदा भी कोई अर्थ नहीं रखती। धार्मिक दृष्टि से भी इस सृष्टि का संपूर्ण कार्यक्रम विश्वनियंता की नीति के अनुसार चलता है -फिर किस बात का अहंकार। बीती हुई कटु घटनाओं को स्मृति से निकालकर उनसे प्राप्त शिक्षा से भविष्य को संवारने की आवश्यकता केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक जीवन में ही नहीं, सर्वत्र है। आथिर्क क्षेत्र में अगर हमने कहीं फि जूलखर्ची की है या सही कार्यां पर खर्च न करके गलत कार्यां पर खर्च किया है, तो अब हम अपनी उस गलती को नए वर्ष में सुधार सकते हैं। समाज सुधार के कार्यां में पिछली कमियों को दूर करके हम नए सिरे से आगे बढ़ सकते हैं। रूठे हुए मित्र- परिजनों से संपर्क करके उन्हें हम पुन: अपना बना सकते हैं। नए लोगों से मैत्री करके अपनी मित्रता का दायरा बढ़ा सकते हैं। देश हित और समाज कल्याण की नई-नई योजनाएं बनाकर उन्हें क्रियान्वित करने में हम अपना योगदान कर सकते हैं।

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