कई खूबियों वाली स्टैंडर्ड गेज मेट्रो स्लिम तो है ही, इसका खर्चा भी ब्रॉड गेज के मुकाबले कम है। अगर मेट्रो के इंजीनियरों की मानें तो इंद्रलोक-मुंडका लाइन को स्टैंडर्ड गेज में तब्दील करने से उसकी लागत में 70 करोड़ रुपये की कमी आ गई है। पैसेंजरों पर इसका असर सिर्फ इतना होगा कि इस मेट्रो की चौड़ाई लगभग तीन इंच कम होगी। दिल्ली मेट्रो ने मुंडका और इंद्रलोक के बीच पहली स्टैंडर्ड गेज लाइन तैयार की है। इससे पहले मेट्रो की जितनी भी लाइनें बनी हैं, वे सभी ब्रॉड गेज की हैं। ब्रॉड गेज और स्टैंडर्ड गेज में फर्क यह है कि पटरी की चौड़ाई कुछ छोटी होती है। मेट्रो के डायरेक्टर (प्रोजेक्ट एंड प्लानिंग) कुमार केशव ने बताया कि स्टैंडर्ड गेज लाइन का फायदा यह होता है कि एक तो यह कम चौड़ी सड़कों पर भी बन सकती हैं। दूसरा यह कि दुनिया के ज्यादातर देशों में स्टैंडर्ड गेज मेट्रो है। जिससे इस गेज के लिए नई तकनीक आसानी से मिल जाती है जबकि ब्रॉड गेज के लिए खुद कंपनियां खोजकर अपने लिए प्रॉडक्ट तैयार कराया जाता है। स्टैंडर्ड गेज होने का असर यह है कि इस लाइन पर खर्च में लगभग 70 करोड़ रुपये की कमी आई है। मेट्रो अधिकारियों का कहना है कि अगर ब्रॉड गेज लाइन तैयार कराई जाती तो इतनी रकम और खर्च करनी पड़ती। इस लाइन पर एक और खासियत यह भी है कि पिछले स्टेशनों से अनुभव लेते हुए इन स्टेशनों पर पैसेंजरों की आवाजाही की व्यवस्था में बदलाव किया गया है। अब स्टेशन का डिजाइन इस तरह से तैयार किया गया है कि स्टेशन में ट्रेन पकड़ने वाले और ट्रेन से उतरकर जाने वालों के लिए अलग-अलग रास्ते होंगे यानी एक ही जगह पैसेंजरों की भीड़ नहीं होगी। इस तरह से पैसेंजरों को आसानी होगी। इस गेज का नेगेटिव पॉइंट सिर्फ इतना ही है कि इस पर चलने वाली ट्रेनों के कोच की चौड़ाई लगभग 3 इंच छोटी होती है। मेट्रो अधिकारियों का कहना है कि आमतौर पर 4 कोच वाली ब्रॉड गेज ट्रेन में 1,176 पैसेंजर ले जाए जा सकते हैं लेकिन स्टैंडर्ड गेज में 1,034 पैसेंजर ले जाने की क्षमता होती है यानी 142 पैसेंजर कम। लेकिन इसके अलावा स्टैंडर्ड गेज का सबसे बड़ा फायदा यही है कि इस तरह की लाइनें बनाने के लिए कम जगह की जरूरत होती है।
Tuesday, February 23, 2010
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