निजामुद्दीन ( नई दिल्ली ) से मेरठ के पल्लवपुरम तक हाईस्पीड ट्रेन ब्रॉडगेज पर दौड़ेगी। आरआरटीएस ( रैपिड रेल ट्रांसपोर्ट सिस्टम ) की सीआरसी ( कंसल्टेंसी रिव्यू कमिटी ) की बैठक में यह फैसला किया गया। बैठक में बोगी के स्टैंडर्ड , इंटरनल डिजाइन , स्टेशन के साइज और डिजाइन पर भी मंथन हुआ। प्रस्ताव आया कि कोच की लंबाई 26 मीटर रखी जाए और यह एल्युमिनियम का बना हो। बोगी में कॉमन एसी हो। आरआरटीएस टास्क फोर्स की बैठक में प्लान फाइनल होगा। दिल्ली में हुई इस बैठक में मेट्रो प्रोजेक्ट कंसल्टेंट कंपनी , हाईस्पीड ट्रेन कंसल्टेंसी कंपनी के इंजीनियरों और सीआरसी अफसरों ने हिस्सा लिया। लगातार कई घंटे चली बैठक में हाईस्पीड ट्रेन के इंजन साइज , कोच , स्टेशन , कोच में सीटिंग डिजाइन पर बातचीत हुई। बैठक में सबसे महत्वपूर्ण फैसला यह हुआ कि हाईस्पीड ट्रेन ब्रॉडगेज पर दौड़ेगी। ट्रेन की बोगी एल्युमिनियम से बनी होगी। इसमें कॉमन एसी होगा , 2 ट्रेनों को मेन स्टेशन से छोड़ते वक्त कम से कम 5 या 5.5 किलोमीटर का अंतर होना चाहिए। इन सभी पॉइंट पर टेक्निकल कमिटी और कंसल्टेंसी कंपनी की एक राय बनी। फिलहाल यह तय नहीं हो पाया है कि हाईस्पीड ट्रेन में कितने कोच होंगे। बैठक में 6 और 9 बोगी का प्रस्ताव आया है। कोच के साइज पर भी आखिरी फैसला नहीं किया जा सका। वैसे रेलवे के कोच 24 मीटर लंबे और 3.7 मीटर चौड़े हैं। हाईस्पीड ट्रेन के कोच को 26 मीटर लंबा और 3.7 मीटर चौड़ा बनाने का प्रपोजल है। कोच का डिजाइन फाइनल होने के बाद ही स्टेशन का डिजाइन फाइनल होगा। अभी यह भी तय नहीं हो पाया कि कोच में कितनी सीट होगी। 2 और प्रस्ताव कमिटी के सामने पेश हुए। पहले प्रस्ताव में ट्रेन में 64 सीट और दूसरे प्रस्ताव में 115 सीट डिजाइन करने की बात कही गई है। कोच का इंटरनल मेट्रो कोच की तरह होगा। इसमें टॉयलेट फैसिलिटी नहीं होगी और खड़े होने के लिए हैंड हैंडल होंगे। सीआरसी की टेक्निकल कमिटी के मिनट्स तैयार कर उसे टास्क फोर्स की बैठक में पेश किया जाएगा। बैठक में कंसल्टेंसी कंपनी और अन्य टेक्निकल कमिटी में शामिल इंजीनियरों से कहा गया कि हाईस्पीड ट्रेन में किसी भी नई तकनीक का प्रयोगात्मक यूज नहीं किया जाएगा। प्रायोगिक तकनीक ही हाईस्पीड ट्रेन में यूज होगी। सीआरसी के मिनट्स को जल्द ही दिल्ली में होनी वाली आरआरटीएस टास्क फोर्स की बैठक पेश किया जाएगा। हाईस्पीड ट्रेन का रूट पहले ही फाइनल हो चुका है।
Friday, May 27, 2011
Friday, May 20, 2011
खड़गपुर-टाटा रेल खंडों के बीच 26 मई तक रात 10 बजे से सुबह पांच बजे तक यात्री रेलगाड़ियों की आवाजाही बंद
पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा कारणों के चलते 26 मई तक रात के दौरान यात्री रेलगाड़ियों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई है। दक्षिण-पूर्व रेलवे ने कहा, 'सुरक्षा कारणों को देखते हुए खड़गपुर-आदा, चक्रधरपुर-राउरकेला और खड़गपुर-टाटा रेल खंडों के बीच 26 मई तक रात 10 बजे से सुबह पांच बजे तक यात्री रेलगाड़ियों की आवाजाही बंद रहेंगी।' बयान के मुताबिक कुछ रेलगाड़ियों की सेवाओं में बदलाव किया गया और कई के समय में भी परिवर्तन किए गए हैं। गौरतलब है कि पश्विम बंगाल के पश्चिमी मिदनापुर में 28 मई 2010 को ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस हादसे के बाद रेलगाड़ियों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई थी। इस हादसे में 148 लोग मारे गए थे।
सब दोस्त राजीव चौक पर मिलते हैं फिर साथ में कॉलेज जाते हैं।
वैसे तो राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के आसपास कोई कॉलेज नहीं है लेकिन फिर भी स्टूडेंट्स के बीच यह स्टेशन काफी हिट है। इसकी पहली वजह तो यही है कि कनॉट प्लेस यूथ के बीच काफी पॉपुलर है और यहां घूमने, खाने-पीने और शॉपिंग करने के लिए काफी जगहें हैं। यहां स्टूडेंट्स कॉलेज शुरू होने से पहले या खत्म होने के बाद शॉपिंग करने के लिए आते हैं। स्टूडेंट्स के बीच सबसे पॉपुलर मार्केट्स में से एक जनपथ भी यहीं है। दूसरी वजह यह भी है कि राजीव चौक दिल्ली मेट्रो का सबसे बड़ा इंटरचेंज पॉइंट है। दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले स्टूडेंट्स अपने कॉलेज के दोस्तों से यहीं मिलते हैं और फिर साथ में कॉलेज जाते हैं। नॉर्थ कैंपस के किरोड़ीमल कॉलेज से इंग्लिश ऑनर्स कर रही श्वेता ने बताया कि वह राजेंद्र प्लेस में रहती हैं। पहले बस से कॉलेज जाती थीं लेकिन जब से कॉलेज में ग्रुप बना, सब दोस्त राजीव चौक पर मिलते हैं फिर साथ में कॉलेज जाते हैं। कभी-कभी शॉपिंग का मूड होता है तो यहां से शॉपिंग भी हो जाती है।
Monday, May 16, 2011
सवारी ट्रेन की चपेट में एक मिनी बस के आ जाने से हुई दुर्घटना में मरने वालों यात्रियों की संख्या बढ़ कर 8
बिहार के भोजपुर जिले में आरा-सासाराम रेलखंड पर पीरो स्टेशन के नजदीक बीती रात फाटक रहित रेलवे क्रॉसिंग पर पटना-सासाराम सवारी ट्रेन की चपेट में एक मिनी बस के आ जाने से हुई दुर्घटना में मरने वालों यात्रियों की संख्या बढ़ कर 8 हो गई है। पीरो के डीएसपी शिवचंद्र सिंह ने बताया कि बारातियों को ले जा रही मिनी बस के ट्रेन की चपेट में आने से घटनास्थल पर मरने वाले 7 बारातियों में से एक के शव को ग्रामीण अपने साथ लेकर बक्सर जिला चले गए थे। उन्होंने बताया कि इस दुर्घटना में घायल 23 बारातियों में से 13 को इलाज के लिए जिला मुख्यालय आरा सदर अस्पताल भेजा गया था। इनमे से एक ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया था। सिंह ने बताया कि बक्सर जिला के सोनबरसा गांव निवासी काशीनाथ यादव के पुत्र अनिल यादव की बारात मिनी बस से तरारी थाना अंतर्गत सैदनपुर गांव निवासी शब्बीर यादव के घर जा रही थी तभी बस पीरो स्टेशन के नजदीक बीती रात फाटक रहित रेलवे क्रासिंग पर पटना-सासाराम सवारी ट्रेन की चपेट में आकर पास के खड्ड में पलट गई थी।
Tuesday, May 10, 2011
दुपहिया वाहन मेट्रो की पार्किंग में खड़ा करते हैं और फिर वहां से मेट्रो पकड़कर रवाना हो जाते
लगभग एक दशक पहले तक शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि दिल्ली के पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम में मोड़ आएगा, जो कार में सफर करने वालों से कार को मोह भी छुड़ा ले। लेकिन दिल्ली मेट्रो ने यह कर दिखाया है। दरअसल, ऐसे बदलाव के लिए जहां दिल्ली के ट्रैफिक जाम की बढ़ती समस्या को क्रेडिट जाता है, वहीं इसके लिए मेट्रो के कम्फर्ट और नियमित सर्विस ने भी लोगों को अपनी ओर आकषिर्त किया है।
दिल्ली में न सिर्फ बिजनेसमैन बल्कि ऐसे नौकरीपेशा लोगों की कमी नहीं है, जो अब घर से रवाना तो कार में होते हैं लेकिन अपने डेस्टिनेशन तक पहुंचते मेट्रो से हैं। ऐसे लोग अपनी कारें या फिर दुपहिया वाहन मेट्रो की पार्किंग में खड़ा करते हैं और फिर वहां से मेट्रो पकड़कर रवाना हो जाते हैं। दरअसल, मेट्रो की इस पार्किंग की प्लानिंग ने भी लोगों की आदत बदलने में अहम भूमिका निभाई है। इस वक्त दिल्ली और एनसीआर में मेट्रो के जिन स्टेशनों पर पार्किंग का इंतजाम है, वहां लगभग 75,000 कारें या इसके बराबर दुपहिया वाहन खड़े हो सकते हैं। अगर इन कारों की जगह दुपहिया हों तो उनकी तादाद और भी ज्यादा है।
जनकपुरी में रहने वाले अरविंद मिश्रा का कहना है कि मेट्रो की पार्किंग की यह सुविधा पार्क एंड राइड की तरह ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि मेट्रो में पार्किंग और मेट्रो के सफर का भाड़ा देना पड़ता है। उनका कहना है कि अगर पार्किंग सुविधा नहीं होती तो शायद कार या दुपहिया के लोग मेट्रो में शिफ्ट नहीं होते। इसकी वजह यह है कि जिन लोगों के घर मेट्रो स्टेशन से चार-पांच किमी भी दूर हैं तो वे शायद मेट्रो को नजरंदाज करते, क्योंकि उन्हें पहले मेट्रो स्टेशन तक पहुंचने के लिए साधन खोजना पड़ता। मिश्रा के मुताबिक उनका घर भी मेट्रो के जनकपुरी (वेस्ट) स्टेशन से लगभग 3.5 किमी की दूरी पर है। ऐसे में उन्हें कोई दिक्कत नहीं। वह पंखा रोड से जनकपुरी वेस्ट पहुंचते हैं और वहां से नोएडा के लिए ट्रेन पकड़कर ऑफिस पहुंच जाते हैं। लेकिन अगर पाकिर्ंग की सुविधा नहीं होती तो शायद वे मेट्रो के बजाय कार से ही अपने डेस्टिनेशन तक जाना पसंद करते।
खुद दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के सीनियर अफसर भी मानते हैं कि मेट्रो स्टेशन पर पार्किंग उनकी योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है और आगे भी रहेगा। दिल्ली मेट्रो के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी अनुज दयाल का कहना है कि जब मेट्रो की प्लानिंग की गई थी, उस वक्त भी इस मसले पर सोचा गया था और तय किया गया था कि जिन स्टेशनों पर भी मुमकिन हो, पार्किंग सुविधा दी जाए। इसकी वजह यह थी कि उसी वक्त ही सोच लिया गया था कि अगर सड़कों से प्राइवेट वाहनों को कम करना है तो इसके लिए पार्किंग की सुविधा भी दी जाए। जिस तरह से मेट्रो स्टेशनों पर पाकिर्ंग में हमेशा वाहन भरे रहते हैं, उससे साफ है कि यह प्लानिंग बेहद कामयाब रही है और इसकी वजह से ही कार और दुपहिया वाहन वाले मेट्रो में सफर के लिए प्रोत्साहित हुए हैं।
यही नहीं, दिल्ली मेट्रो अब थर्ड फेज में भी इस दिशा में काम कर रही है और उसकी कोशिश होगी कि जिन स्टेशनों पर जमीन उपलब्ध हो, वहां पार्किंग की सुविधा दी जाए। इसका फायदा यह होता है कि मेट्रो लाइन से 4-5 किमी की दूरी पर रहने वाले लोग भी मेट्रो तक पहुंच सकते हैं। हालांकि कई जगह रोड ट्रांसपोर्ट है लेकिन कई लोग उसमें सफर करने के बजाय अपना ही वाहन इस्तेमाल करना चाहते हैं। ऐसे लोग मेट्रो स्टेशन तक वाहन लाकर मेट्रो का उपयोग करते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए एयरपोर्ट मेट्रो लाइन के नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के ऊपर बहुमंजिला पार्किंग बनाई जा रही है। इस वक्त दिल्ली मेट्रो के स्टेशनों पर सबसे बड़ी पार्किंग पटेल चौक मेट्रो स्टेशन पर है और जल्द ही कुछ और स्टेशनों पर पार्किंग का विस्तार किया जाना है।
Sunday, May 1, 2011
ट्रेन का टिकट नहीं मिल पा रहे
गर्मी की छुट्टियों में घर जाने वाले यात्रियों को ट्रेन का टिकट कटाने के लिए गुड़गांव रेलवे स्टेशन पर लंबी लाइनों में खड़ा होना पड़ रहा है। इसके बाद भी रिजर्वेशन काउंटर से टिकट नहीं मिल पा रहे हैं। अधिकांश ट्रेनों में एक महीने तक कोई जगह नहीं है। गुड़गांव में उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उड़ीसा, बंगाल, मध्य प्रदेश एवं अन्य स्टेट के लाखों लोग रहते हैं। परिवार वाले गर्मी की छुट्टियों में अपने घर जाते हैं। इनमें से कई लोग बाहर घूमने भी जाते हैं। लेकिन आलम यह है कि टिकट के लिए लोगों को घंटों लाइन में लगना पड़ रहा है। यहां रेलवे स्टेशन पर रिजर्वेशन के कम काउंटर हैं इसलिए ज्यादा परेशानी हो रही है।
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