Thursday, September 11, 2014

गजब की ट्रेन

गजब मामला है। रेलवे के अधिकारी और कर्मचारी एक ट्रेन की खोज में हलकान हैं। यह ट्रेन 14 दिन से लापता है। अब तक इतनी ही जानकारी मिल सकी है कि इसे हाजीपुर स्टेशन पर आखिरी बार देखा गया था। इसके बाद यह कहां गई, इस बारे में न पूर्वोत्तर रेलवे को पता है और न ही पूर्व-मध्य रेलवे को। 
रेलवे सूत्रों के मुताबिक 25 अगस्त की रात गोरखपुर-नरकटियागंज रूट पर घुघली स्टेशन के पास एक मालगाड़ी के नौ डिब्बे पलटने से रूट बाधित हो गया था। ऐसे में इस रूट की ट्रेनों को देवरिया, छपरा और बनारस रूट से चलाया गया। गोरखपुर-मुजफ्फरपुर पैसेंजर ट्रेन को भी बदले हुए रूट से भेजा गया। लेकिन इंटरलॉकिंग की वजह से यह रूट भी बंद हो गया और ट्रेन को हाजीपुर में ही रद्द करना पड़ा।
 

हाजीपुर में ट्रेन की बोगियां खड़ी कर दी गईं। करीब चार दिन बाद जब सभी रूट सामान्य हो गए तो इस पैसेंजर ट्रेन को फिर चलाने का फैसला किया गया, लेकिन तभी पता चला कि ट्रेन तो हाजीपुर में है ही नहीं। रेलवे के ऑफिसर ढूंढ-ढूंढ कर परेशान हैं, लेकिन ट्रेन का पता नहीं लग रहा। हालांकि, उन्होंने किसी तरह 10 बोगियों की व्यवस्था कर पैसेंजर ट्रेन को बहाल कर दिया है। 
समस्तीपुर मंडल की एक पैसेंजर ट्रेन रैक मरम्मत के लिए गोरखपुर यार्ड भेजी गई थी। यहां से वह ठीक कर समय से लौटाई नहीं गई। इस बीच जब गोरखपुर-मुजफ्फरपुर पैसेंजर ट्रेन की रैक हाजीपुर पहुंची तो वहां के कर्मचारियों को लगा कि हमारी रैक लौट आई है। इसके बाद संभवत: उस रैक को किसी और रूट पर भेज दिया गया। लेकिन कर्मचारियों ने पूर्वोत्तर रेलवे से संपर्क कर यह जानने का प्रयास नहीं किया तो यह वही रैक है या नहीं। इसी तरह की चूक पूर्वोत्तर रेलवे ने भी की। उसने हाजीपुर से ट्रेन न लौटने पर समय रहते कोई कार्रवाई नहीं की।
 
देश भर में ट्रेनों के एक-एक कोच और इंजन की मॉनिटरिंग के लिए कोचिंग ऑपरेशन इंफर्मेशन सिस्टम (सीओआईएस) का उपयोग किया जाता है। इस सिस्टम पर आरम्भिक स्टेशन से ट्रेन चलने से पहले ही हर कोच का नम्बर व गाड़ी के कुल डिब्बों की फीडिंग की जाती है। इसी आधार पर ट्रेनों के चार्ट में कोच नम्बर फीड किए जाते हैं। इसके बाद रास्ते के हर स्टेशन पर सीओआईएस के मॉनिटर पर ट्रेन का हर डेटा मिल जाता है। साल में एक बार रेलवे अपनी सभी बोगियों की गणना कराता है। किसी एक दिन के कुछ घंटे के भीतर एक साथ रेलवे के हजारों कर्मचारी रेलवे की बोगियों की गणना करते हैं। अब तभी इस रैक का पता लगने की उम्मीद है।

24 करोड़ रुपये) की रिश्वत देने का मामला

ब्रिटेन के सीरियस फ्रॉड ऑफिस (एसएफओ) ने इंजीनियरिंग कंपनी ऐल्सटम नेटवर्क यूके लिमिटेड के खिलाफ दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के अधिकारियों को 30 लाख यूरो (24 करोड़ रुपये) की रिश्वत देने का मामला दर्ज किया है।
इस मामले में 6 अक्टूबर को साउथवॉर्क क्राउन कोर्ट में सुनवाई होगी। कंपनी के खिलाफ कुछ छह आरोप लगाए गए हैं जिनमें दो डीएमआरसी कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े हैं। बाकी चार मामले पोलैंड और ट्यूनिशिया के हैं।

एसएफओ का आरोप है कि मेट्रो से ठेके पाने के लिए ऐल्सटम के कुछ निदेशकों ने 1 अगस्त 2000 से 9 अगस्त 2006 के बीच रिश्वत दी या देने का वादा किया। चार्जशीट में दो ऐसे वाकयों का जिक्र किया गया है जब रिश्वत दी गई। पुलिस के मुताबिक, '12 सितंबर 2001 को इंडो यूरोपियन वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड से कंसल्टेंसी अग्रीमेंट के नाम पर एक करोड 98 लाख 95 हजार रुपये दिए गए। 3 मई 2002 को ग्लोबल किंग टेक्नॉलजी लिमिटेड से कंसल्टेंसी अग्रीमेंट के नाम पर करीब 31 लाख यूरो दिए गए।'
हिंदुस्तान टाइम्स अखबार की खबर के मुताबिक भारत के शहरी विकास मंत्रालय को ऐसे किसी आरोप के बारे में नहीं पता है। एक अधिकारी ने अखबार को बताया, 'हमें नहीं पता है कि ऐल्सटम पर मेट्रो अधिकारियों को रिश्तव देने के आरोप लगे हैं। अभी कोई सूचना हमें नहीं दी गई है। जब हमें गृह मंत्रालय या सीबीआई से लिखित में कुछ मिलेगा तो हम कार्रवाई करेंगे।'
डीएमआरसी ने भी इस बारे में कुछ कहने से इनकार कर दिया।

Tuesday, September 9, 2014

हर मेट्रो स्टेशन पर ऐसा ही नजारा

मेट्रो पिलर इन दिनों नोएडियंस के बीच एड्रेस बताने का नया ट्रेंड हो गए हैं। किसी को एड्रेस समझाना हो या मेट्रो के पास रोड पर कहीं मिलने की लोकेशन बतानी हो, तो पिलर नंबर बताने से तुरंत सब क्लीयर हो जाता है।
पहले लोग मार्केट की दुकानों और आसपास की आसानी से दिखने वाली चीजों के सहारे एड्रेस बताते थे, लेकिन नोएडा में मेट्रो के आने के साथ से ही नोडियएंस के एड्रेस बताने का तरीका बदल गया है। अब मेट्रो स्टेशन के पास की पिलर संख्या बता दी जाती है, जिससे पहुंचने वाला लोकेशन आसानी से पता लगा लेता है। इस सुविधा के अलावा, इस तरीके से टाइम की भी बचत हो रही है। स्टूडेंट मेधा ने बताया कि मेट्रो के पिलर नंबर का पता चलने के बाद एड्रेस पता करना बहुत इजी हो जाता है। अट्टा मार्केट में बहुत सारी छोटी-छोटी कई मार्केट्स हैं। ऐसे में सिर्फ मार्केट के नाम के आधार पर ही दुकान तक पहुंचना मुश्किल होता है। वहीं, मेट्रो का पिलर नंबर पता होने तुरंत आइडिया लग जाता है कि जाना कहां है।
मेट्रो स्टेशन पर पीक आवर्स में बहुत भीड़ रहती है। ऐसे में मेट्रो स्टेशन पर ग्रुप में फ्रेंड्स के साथ खड़े होने में बहुत दिक्कत होती है। स्टेशन पर भीड़ होने की वजह से सिक्युरिटी भी डिस्टर्ब होती है। इसी को देखते हुए अब लोग मेट्रो स्टेशन के नीचे खाली स्पेस में खड़े होते हैं।
स्टूडेंट विशाल बेलवाल ने बताते हैं कि मेट्रो स्टेशन पर खड़े होने से अच्छा है कि स्टेशन के नीचे खाली स्पेस में खड़ा हुआ जाए। वहां भीड़ भी नहीं होती है, इसलिए इंतजार करने में दिक्कत नहीं होती है। हम सभी फ्रेंड्स नोएडा सिटी सेंटर के मेट्रो पिलर नंबर 150 पर मिलते हैं और संख्या पता होने की वजह से किसी को कंफ्यूजन नहीं होता।
नोएडा के मेट्रो स्टेशन पर हर पिलर को नंबर दिए गए हैं। इससे लोगों को एड्रेस बताने में ज्यादा परेशानी नहीं होती। लेकिन ये नंबर हर पिलर पर मोटे अक्षरों में नहीं लिखे गए हैं, जिससे लोग आसानी से इनको भी लोकेट नहीं कर पाते। एचआर मैनेजर ध्रुव माहेश्वरी ने बताया कि नोएडा में सभी पिलर्स पर संख्या नहीं लिखी जाने से लोकेशन का पता करने में थोड़ी परेशानी होती है। अगर सभी पिलर पर नंबर लिखा हुआ तो, लोकेशन तुरंत समझ में आ जाएगी।
मेट्रो
 पिलर पर नंबर होने की सबसे खास बात यह है कि मेट्रो मैनेजमेंट को रिपेयर आदि का काम करने मेंसहूलियत मिलती है। कुणाल भास्कर ने बताया कि मेट्रो पिलर पर नंबर होने से मेट्रो मैनेजमेंट को इनकेरखरखाव का काम करने में आसानी होती है। कुछ टाइम पहले नोएडा सिटी सेंटर के एक पिलर में दरार आने परनंबर की मदद से उसे तुरंत लोकेट कर लिया गया। अगर यह नंबर नहीं होता, तो उस पिलर की पहचान करने मेंकाफी वक्त लग जाता।
नोडिएयंस
 भी चाहते हैं कि पिलर से एड्रेस बताना यहां भी दिल्ली की तर्ज पर ही आसान हो जाए। दिल्ली में हरमेट्रो स्टेशन के नीचे लगे पिलर को एक नंबर दिया गया है, जिसके आधार पर लोग लोकेशन मार्क करते हैं।दिल्ली में मेट्रो स्टेशन के पास घर होने पर लोग गली की लोकेशन भी मेट्रो के पिलर के नंबर के बेस पर ही देतेहैं। लेकिन नोएडा की तस्वीर इससे बिल्कुल अलग है। एक पिलर को नंबर दिया गया है, तो बीच में 5-6 पिलरपर नंबर डाले ही नहीं गए हैं। हर मेट्रो स्टेशन पर ऐसा ही नजारा है। इससे लोग कंफ्यूज हो जाते हैं। 

Friday, September 5, 2014

चोर-जेबकतरे पांच मेट्रो मुसाफिरों की जेब काट रहे हैं

24 दिसंबर 2002 में दिल्ली मेट्रो पहली बार छह स्टेशनों के साथ शुरू हुई थी। इन 11 सालों में दिल्ली मेट्रो ने तूफानी रफ्तार के साथ विस्तार करते हुए अपना नेटवर्क 145 स्टेशनों तक पहुंचा दिया है। हर दिन औसतन 25 लाख मुसाफिर इसकी सवारी करते हैं। इन मुसाफिरों के जानमाल की सिक्योरिटी सीआईएसएफ और दिल्ली पुलिस के कंधों पर है। आंकड़ा यह है कि इन 25 लाख मुसाफिरों की सिक्योरिटी दिल्ली पुलिस के सिर्फ 200 जवानों-अफसरों पर है। सच यह है कि इस मामूली तादाद से लाखों मुसाफिरों की सिक्योरिटी नामुमकिन है। इसका अंदाजा चोरों को हो चुका है। हर दिन चोर-जेबकतरे पांच मेट्रो मुसाफिरों की जेब काट रहे हैं। कई बार उनका मोबाइल और लैपटॉप भी लेकर रफूचक्कर हो जा रहे हैं।
इस साल 3 सितंबर 2014 तक दिल्ली मेट्रो पुलिस ने कुल 1447 मामले दर्ज किए हैं। इनमें ज्यादातर मामले जेबतराशी के हैं। जेब काटने के अलावा चोरों की नजर मोबाइल फोन और कई बार लैपटॉप पर होती है। पिछले साल के मुकाबले यह आंकड़ा पांच गुना बढ़ गया है। पिछले साल 3 सितंबर 2013 तक दिल्ली मेट्रो पुलिस ने सिर्फ 287 मामले दर्ज किए थे। दिल्ली मेट्रो के एक सीनियर ऑफिसर बताते हैं कि जेबतराशों के रैकेट राजीव चौक, कश्मीरी गेट, चावड़ी बाजार और चांदनी चौक पर सबसे ज्यादा एक्टिव हैं। दूसरे स्टेशनों पर भी मोबाइल और पर्स गायब हो जाने के मामले आए दिन दर्ज हो रहे हैं।

पहले सीट पाने की जद्दोजहद में धक्का-मुक्की की तस्वीर हर स्टेशनों पर देखी जाती थी। लेकिन अब मेट्रो में सिर्फ एंट्री करने के लिए मुसाफिरों में होड़ लगी रहती है। इससे मेट्रो में होने वाली भीड़ का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। सच यह है कि नेटवर्क में तेजी से हो रहे विस्तार के बावजूद मेट्रो में भीड़ बढ़ती जा रही है। मेट्रो के भीतर घात लगाकर बैठे जेबतराश इसी मौके का फायदा उठाकर लोगों की जेब और सामानों पर हाथ साफ कर देते हैं। जेबतराशों की धरपकड़ की जिम्मेदारी मोटेतौर पर दिल्ली पुलिस की है लेकिन सिर्फ 200 पुलिसकर्मियों की संख्या के साथ 25 लाख मुसाफिरों और 145 स्टेशनों की निगरानी का सवाल पूछना भी बेमानी है।
मेट्रो पुलिस के एक सीनियर ऑफिसर बताते हैं कि 200 लोगों पर केस दर्ज करने और मामलों को सुलझाने के अलावा भी कई जिम्मेदारी है। इन्हीं जवानों को मेट्रो में पेट्रोलिंग, चेकिंग करनी होती है। जेबतराशों के रैकेट पर नजर रखनी होती है। इनके अलावा थानों में ड्यूटी, इमरजेंसी ऑफिसर, ड्यूटी ऑफिसर, मालखाने की देखरेख भी हमें ही करनी पड़ती है। ऑफिसर कहते हैं कि फिलहाल दिल्ली मेट्रो पुलिस को कम से कम 10 गुना ज्यादा यानीकि 2 हजार पुलिसकर्मियों की जरूरत है। तभी जेबतराशों पर नकेल कसने के बारे में सोचा जा सकता है। मेट्रो में बढ़ती वारदात को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने कई बार होम मिनिस्ट्री को इसकी डीटेल भेजी है। साथ ही, जवानों की संख्या बढ़ाए जाने की मांग भी की है। अगर जल्द ही यह मांग पूरी नहीं होती है तो मेट्रो पुलिस स्टेशनों में दर्ज हो रहे मामलों को सुलझाने का भार बढ़ता जाएगा।
दिल्ली
 मेट्रो की शास्त्री पार्क पुलिस ने एक स्नैचर जितेंद्र(22) को अरेस्ट किया है। जितेंद्र प्रताप नगर का रहनेवाला है।17 अगस्त की रात साढ़े नौ बजे पुलबंगश मेट्रो स्टेशन पर यह स्नैचर एक महिला का पर्स छीनकरफरार हो गया था। मेट्रो पुलिस ने जितेंद्र की गिरफ्तारी पर इसी तरह के तीन मामले सुलझाने का दावा किया है।डीसीपी संजय भाटिया ने बताया कि आजाद मार्केट की रहने वाली आबिदा खान 17 अगस्त की रात मेट्रो सेबाहर  रही थीं। इसी दौरान पीछे से आकर जितेंद्र ने उनका पर्स छीन लिया था। पर्स में दो मोबाइल फोन थे।संजय भाटिया ने शास्त्री पार्क मेट्रो स्टेशन के एसएचओ आनंद लाकड़ा की अगुवाई में एक टीम गठित की और1सितंबर को इसे अरेस्ट कर लिया। पूछताछ में जितेंद्र ने कहा है कि वह घात लगाकर सन्नाटे का इंतजार करताथा। जब लोग कम हो जाते थे तो वह लोगो के पर्स छीनकर भाग जाता था। 

Wednesday, September 3, 2014

यात्रियों की सुविधा के लिए विशेष लोकल ट्रेनें

गणपति विसर्जन के दौरान यात्रियों की सुविधा के लिए पश्चिम रेलवे 8 सितंबर, 2014 की रात को चर्चगेट तथा विरार के बीच चार जोड़ी विशेष लोकल ट्रेनें चलाएगी। ये ट्रेनें 8 तथा 9 सितंबर की मध्य रात्रि को चलाई जाएंगी। ये विशेष ट्रेनें सभी स्टेशनों पर ठहरेंगी। डाउन दिशा में पहली विशेष लोकल चर्चगेट से रात 1.15 बजे छूटेगी और 2.47 बजे विरार पहुंचेगी।
दूसरी विशेष लोकल चर्चगेट से 1.55 बजे रवाना हो कर 3.30 बजे विरार पहुंचेगी। तीसरी विशेष लोकल चर्चगेट से 2.25 बजे चल कर 4.00 बजे विरार पहुंचेगी तथा चौथी विशेष लोकल चर्चगेट से 3.20 बजे छूट कर 4.55 बजे विरार पहुंचेगी। अप दिशा में पहली विशेष लोकल विरार से रात के 12.45 बजे रवाना होगी और 1.45 बजे चर्चगेट पहुंचेगी, दूसरी विशेष लोकल ट्रेन विरार से रात 12.45 बजे चलकर 2.17 बजे चर्चगेट पहुंचेगी, तीसरी विशेष लोकल विरार से 1.40 बजे चलकर 3.12 बजे चर्चगेट पहुंचेगी जबकि चौथी विशेष लोकल विरार से 2.55 बजे छूटकर 4.30 बजे चर्चगेट पहुंचेगी।

Monday, September 1, 2014

कानपुर-दिल्ली के बीच सेमी हाईस्पीड ट्रेन दौड़ने का रास्ता साफ

नवंबर में आगरा और दिल्ली के बीच सेमी हाईस्पीड ट्रेन दौड़ने का रास्ता साफ होते ही कानपुर-दिल्ली रूट की बारी आ गई है। नॉर्थ सेंट्रल रेलवे ने इस रूट पर जरूरी कामों के लिए रेलवे बोर्ड को 120 करोड़ रुपये से ज्यादा का प्रपोजल भेजा है। सीपीआरओ नवीन बाबू के अनुसार, प्रपोजल पाइपलाइन में है। जल्द इसके फाइनल होने की उम्मीद है। इसके बाद काम शुरू होगा।
नवीन बाबू के अनुसार प्रपोजल में ट्रैक के दोनों तरफ संवेदनशील इलाकों में फेंसिंग (दीवार बनाने) के अलावा ट्रैक भी दुरुस्त किया जाएगा। प्रस्तावित ट्रेन की तेज स्पीड के मद्देनजर ट्रैक को परफेक्ट बनाना होगा। अभी कई जगहों पर जहां ट्रैक में घुमाव है, उसे भी ठीक करना बेहद जरूरी होगा। इसके अलावा ओवरहेड इलेक्ट्रिक वायर भी ठीक करने होंगे।
जुलाई फर्स्ट वीक में आगरा-दिल्ली के बीच सेमी हाईस्पीड ट्रेन का ट्रायल शुरू होने के पहले ही रेलवे बोर्ड ने कानपुर रूट पर भी ऐसी ही ट्रेन चलाने की परमिशन दी थी। बाद में रेल बजट में भी इसका ऐलान किया गया था। बीते कुछ महीनों में नॉर्थ सेंट्रल रेलवे ने काफी मेहनत के बाद 440 किमी लंबे इस ट्रैक को चेक कर खामियों की एक रिपोर्ट बनाई, इसके बाद कामों का एक प्रपोजल बनाकर रेलवे बोर्ड को भेजा। अब प्रपोजल फाइनल होते ही रेलवे काम शुरू कराएगा। आगरा रूट का तजुर्बा भी एनसीआर के काम आएगा।
दिल्ली-हावड़ा रूट पर दिल्ली-कानपुर के स्ट्रेच को बेहद बिजी माना जाता है। एक के पीछे एक ट्रेन होने के कारण इस रूट पर अक्सर ट्रेनें लेट रहती हैं। फेस्टिव सीजन और गर्मियों में ट्रेनों का लोड ज्यादा होने के कारण घंटों की लेटलतीफी आम बात हो जाती है। रूट पर कई जगह कॉशन होने के कारण ट्रेनें धीमे चलती हैं।
फिलहाल इस रूट पर राजधानी और शताब्दी ट्रेनें ही 440 किमी की दूरी करीब 4:30 घंटे में तय करती हैं। इसके अलावा बाकी मेल-एक्सप्रेस ट्रेनें यह दूरी 6-8 घंटे में पूरी करती हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत सर्दियों में कोहरे के कारण होती है। दिसंबर-जनवरी में तो ट्रेनें स्टेशन टु स्टेशन चलने के कारण 20-25 किमी प्रति घंटे की स्पीड से दौड़ती हैं।

कानपुर-दिल्ली के बीच सेमी हाईस्पीड ट्रेन दौड़ने का रास्ता साफ

नवंबर में आगरा और दिल्ली के बीच सेमी हाईस्पीड ट्रेन दौड़ने का रास्ता साफ होते ही कानपुर-दिल्ली रूट की बारी आ गई है। नॉर्थ सेंट्रल रेलवे ने इस रूट पर जरूरी कामों के लिए रेलवे बोर्ड को 120 करोड़ रुपये से ज्यादा का प्रपोजल भेजा है। सीपीआरओ नवीन बाबू के अनुसार, प्रपोजल पाइपलाइन में है। जल्द इसके फाइनल होने की उम्मीद है। इसके बाद काम शुरू होगा।
नवीन बाबू के अनुसार प्रपोजल में ट्रैक के दोनों तरफ संवेदनशील इलाकों में फेंसिंग (दीवार बनाने) के अलावा ट्रैक भी दुरुस्त किया जाएगा। प्रस्तावित ट्रेन की तेज स्पीड के मद्देनजर ट्रैक को परफेक्ट बनाना होगा। अभी कई जगहों पर जहां ट्रैक में घुमाव है, उसे भी ठीक करना बेहद जरूरी होगा। इसके अलावा ओवरहेड इलेक्ट्रिक वायर भी ठीक करने होंगे।
जुलाई फर्स्ट वीक में आगरा-दिल्ली के बीच सेमी हाईस्पीड ट्रेन का ट्रायल शुरू होने के पहले ही रेलवे बोर्ड ने कानपुर रूट पर भी ऐसी ही ट्रेन चलाने की परमिशन दी थी। बाद में रेल बजट में भी इसका ऐलान किया गया था। बीते कुछ महीनों में नॉर्थ सेंट्रल रेलवे ने काफी मेहनत के बाद 440 किमी लंबे इस ट्रैक को चेक कर खामियों की एक रिपोर्ट बनाई, इसके बाद कामों का एक प्रपोजल बनाकर रेलवे बोर्ड को भेजा। अब प्रपोजल फाइनल होते ही रेलवे काम शुरू कराएगा। आगरा रूट का तजुर्बा भी एनसीआर के काम आएगा।
दिल्ली-हावड़ा रूट पर दिल्ली-कानपुर के स्ट्रेच को बेहद बिजी माना जाता है। एक के पीछे एक ट्रेन होने के कारण इस रूट पर अक्सर ट्रेनें लेट रहती हैं। फेस्टिव सीजन और गर्मियों में ट्रेनों का लोड ज्यादा होने के कारण घंटों की लेटलतीफी आम बात हो जाती है। रूट पर कई जगह कॉशन होने के कारण ट्रेनें धीमे चलती हैं।
फिलहाल इस रूट पर राजधानी और शताब्दी ट्रेनें ही 440 किमी की दूरी करीब 4:30 घंटे में तय करती हैं। इसके अलावा बाकी मेल-एक्सप्रेस ट्रेनें यह दूरी 6-8 घंटे में पूरी करती हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत सर्दियों में कोहरे के कारण होती है। दिसंबर-जनवरी में तो ट्रेनें स्टेशन टु स्टेशन चलने के कारण 20-25 किमी प्रति घंटे की स्पीड से दौड़ती हैं।